मानसिक विकारों की एकमात्र औषधि है धर्म: पौराणिक जी महाराज

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लोभ ही सभी पापों की जननी, इसके कारण वर्तमान से लेकर भविष्य तक हो जाता है कलंकित          बक्सर खबर। सर्वजन कल्याण सेवा समिति सिद्धाश्रम धाम द्वारा रामरेखा घाट स्थित रामेश्वर नाथ मंदिर परिसर में आयोजित 18वें धर्म आयोजन के तीसरे दिन बुधवार को श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का आयोजन हुआ। कथा वाचन करते हुए आचार्य कृष्णानंद शास्त्री पौराणिक जी महाराज ने कहा कि मनुष्य को दैहिक और मानसिक दो प्रकार के रोगों का भय रहता है। उन्होंने कहा कि दैहिक रोगों का उपचार चिकित्सक और दवाओं से संभव है, लेकिन मानसिक रोगों की औषधि धर्मग्रंथों और आध्यात्मिक साधना में निहित है। मोह, काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष जैसे विकार मानसिक रोग हैं, जो व्यक्ति और समाज दोनों को प्रभावित करते हैं।

आचार्य ने कहा कि लोभ सभी पापों और अनैतिक कार्यों की जननी है। लोभ व्यक्ति के वर्तमान, भूत और भविष्य तीनों को कलंकित कर देता है। लोभ का अंतिम परिणाम विनाश ही होता है। कथा के दौरान उन्होंने हिरण्याक्ष की कथा का वर्णन करते हुए बताया कि लोभ के कारण उसने पृथ्वी का ही हरण कर लिया था। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया और पृथ्वी को पुनः सृष्टि के कल्याण के लिए स्थापित किया। उन्होंने कहा कि आज समाज में बढ़ती अशांति, स्वार्थ और नैतिक मूल्यों के ह्रास के पीछे लोभ प्रमुख कारण है। लोग धन, पद और प्रतिष्ठा की दौड़ में मानवता को भूलते जा रहे हैं।

आचार्य कृष्णानंद शास्त्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा मानसिक विकारों को दूर करने का प्रभावी माध्यम है। कथा के श्रवण से मनुष्य को जीवन की वास्तविकता का बोध होता है और वह परमार्थ के मार्ग पर अग्रसर होता है। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भगवान की महिमा का श्रवण कर धर्म लाभ प्राप्त किया।

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