18वें धर्म आयोजन का समापन, हवन-पूजन, ब्राह्मण भोज और देव विसर्जन संपन्न बक्सर खबर। सर्वजन कल्याण सेवा समिति सिद्धाश्रम धाम द्वारा रामरेखा घाट स्थित रामेश्वर नाथ मंदिर परिसर में आयोजित 18वें धर्म आयोजन के आठवें दिन सोमवार को श्रीमद्भागवत कथा का भावपूर्ण समापन हुआ। कथा के दौरान आध्यात्मिक संदेशों ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। कथावाचक आचार्य कृष्णानंद शास्त्री पौराणिक जी ने कहा कि समिति का संकल्प 18 पुराणों की कथाओं का आयोजन करना है। इसी श्रृंखला में 18वां धर्म आयोजन विधिवत संपन्न हुआ। उन्होंने कहा कि मानव शरीर ईश्वर की विशेष कृपा से प्राप्त होता है। जो इसकी महत्ता नहीं समझता, वह जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। वहीं, जो श्रीहरि की शरण ग्रहण करता है, वह भवसागर से मुक्त हो जाता है।
कार्यक्रम के तहत प्रातः छह बजे से मंडप पूजन, हवन और पूर्णाहुति का आयोजन हुआ। इसके बाद ब्राह्मण भोज, देव विसर्जन और विदाई समारोह संपन्न कराया गया। कथा में महाराज परीक्षित और श्री शुकदेव जी के संवाद का वर्णन करते हुए आचार्य ने कहा कि आत्मा अजर-अमर है, जबकि शरीर नश्वर है। मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं। उन्होंने कहा कि काल ही तक्षक है और मनुष्य परीक्षित के समान है। जीवन के सातों दिन मृत्यु की ओर बढ़ते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने मन और इंद्रियों को भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहिए। पौराणिक जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण ऐसा प्रामाणिक ग्रंथ है, जो मनुष्य को मोक्ष का मार्ग दिखाता है। जब तक सृष्टि रहेगी, भागवत कथा मानव समाज का कल्याण करती रहेगी। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्ति भाव से प्रवचन का श्रवण किया।


































































































