300 साल पुरानी संत दरियादास की दुर्लभ पांडुलिपियां मिलीं 

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कैथी लिपि में लिखी तीन हस्तलिखित पोथियां शोधकर्ताओं के लिए बनेंगी महत्वपूर्ण दस्तावेज                                                                         बक्सर खबर। जिले से भारतीय संत परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक बड़ी और ऐतिहासिक खोज सामने आई है। लगभग 300 वर्ष पुरानी संत कवि दरियादास की तीन दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां मिली हैं। यह अमूल्य धरोहर लक्ष्मीकांत मुकुल के पैतृक पारिवारिक संग्रह से प्राप्त हुई है। बताया जाता है कि इन पोथियों को उनके दादा ने वर्षों पहले सुरक्षित रखा था। पीढ़ियों से यह धरोहर परिवार के संरक्षण में रही। अब ज्ञान भारतम मिशन के तहत इसके महत्व को सामने लाया गया है। प्रारंभिक अध्ययन में संकेत मिले हैं कि इन पांडुलिपियों का निर्माण करीब तीन सौ वर्ष पहले हुआ होगा।

यदि यह अनुमान प्रमाणित होता है तो यह खोज संत साहित्य, लोकभाषा और उत्तर भारत की भक्ति परंपरा के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकती है। दुर्लभ पोथियां हाथ से बने मोटे देशी कागज पर लिखी गई हैं। इनमें प्राकृतिक स्याही का उपयोग हुआ है। लेखन कैथी लिपि में किया गया है, जबकि भाषा भोजपुरी मिश्रित अवधी है। इससे उस दौर की लोकसंस्कृति और भाषाई स्वरूप की झलक मिलती है।पहली पांडुलिपि ‘सतनाम स्तुति’ पर आधारित है। इसमें निर्गुण भक्ति और नाम-स्मरण की महत्ता बताई गई है। दूसरी पोथी ‘प्रेम मूला’ है, जिसे दरियादास की मौलिक रचना माना जाता है। इसमें प्रेम को आध्यात्मिक साधना का आधार बताया गया है। तीसरी पांडुलिपि में भक्ति धारा और संतमत धारा के समन्वय का रोचक वर्णन मिलता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ये पांडुलिपियां केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि उस दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चिंतन की जीवंत दस्तावेज भी हैं। इनकी प्राप्ति से शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और भाषा विशेषज्ञों को संत साहित्य के अनछुए पहलुओं पर काम करने का नया अवसर मिलेगा। संत कवि दरियादास ने बिहार और पूर्वांचल में निर्गुण भक्ति, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक समानता के विचारों को जन-जन तक पहुंचाया था। ऐसे में उनकी दुर्लभ हस्तलिखित रचनाओं का मिलना बक्सर ही नहीं, पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

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