श्रीमद्भागवत साक्षात श्रीकृष्ण का स्वरूप, कलियुग में है कामधेनु: पौराणिक जी 

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सर्वजन कल्याण सेवा समिति के 18वें धार्मिक उत्सव में श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का रसपान कर भावविभोर हुए श्रद्धालु                                                        बक्सर खबर। सर्वजन कल्याण सेवा समिति सिद्धाश्रम धाम द्वारा रामरेखा घाट स्थित रामेश्वर नाथ मंदिर परिसर में आयोजित 18वें धर्म आयोजन के छठे दिन शनिवार को श्रीमद्भागवत कथा का रसपान कराया गया। कथा व्यास आचार्य कृष्णानंद शास्त्री पौराणिक जी ने श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जैसे रामायण भगवान श्रीराम का विग्रह है, वैसे ही श्रीमद्भागवत भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप है। भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के समय उन्होंने उद्धव जी को आश्वस्त किया था कि वे भागवत महापुराण में निवास करेंगे और यही ग्रंथ भक्तों का मार्गदर्शन करेगा। पौराणिक जी ने कहा कि इसी कारण श्रीमद्भागवत को सनातन धर्म का मूल ग्रंथ माना जाता है। यह ग्रंथ भक्तों की आवश्यकता के अनुसार उन्हें आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है। कलियुग में इसे कामधेनु की संज्ञा दी गई है।

कथा के दौरान उन्होंने श्रीकृष्ण की बाल एवं माधुर्य लीलाओं का वर्णन किया। पूतना वध, गोवर्धन धारण, महारास, इंद्र और ब्रह्मा के मान-मर्दन जैसी लीलाओं को मानव कल्याण का आधार बताया। उन्होंने कहा कि इन लीलाओं का श्रवण और कीर्तन दोनों ही मोक्षदायक हैं। आचार्य कृष्णानंद शास्त्री ने बताया कि श्रीकृष्ण ने 11 वर्ष 55 दिन की आयु में कंस का वध किया और बाद में गुरु आश्रम में रहकर 64 कलाओं तथा विभिन्न विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया। गुरु दक्षिणा के रूप में उन्होंने गुरु पुत्र को यमलोक से वापस लाकर अपने गुरु को समर्पित किया। उन्होंने श्रीकृष्ण के मथुरा और द्वारका काल का भी वर्णन किया। कहा कि जरासंध के बार-बार के आक्रमणों का सामना करने के बाद श्रीकृष्ण ने समुद्र के बीच भव्य द्वारका नगरी की स्थापना की। द्वारका तत्कालीन युग की अद्वितीय और दिव्य नगरी थी।

कथा के अंत में उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत का श्रवण और मनन मनुष्य को सांसारिक सुख के साथ-साथ मोक्ष का मार्ग भी प्रदान करता है। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्ति भाव से कथा का श्रवण किया।

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