साइकिल से सत्तू बेचने जाता अशोक, साथ में छोटा बेटा

बक्सर खबर। कहतें है हिम्मते मर्दां तो मर्दे खुदा। अर्थात मनुष्य अगर हिम्मत जुटाए रखे तो हर समस्या से टकरा सकता है। वैसे लोगों की मदद खुदा भी करते हैं। ऐसी ही जीवट प्रवृति के हैं अशोक प्रजापति। इन्हें आंखों से दिखाई नहीं देता। फिर भी साइकिल लेकर बाजार जाते हैं। सत्तू बेचते हैं और घर वापस आते हैं। क्योंकि उनके कंधे पर तीन-तीन बच्चों की जिम्मेवारी है।

जिन्हें पढ़ाकर वे इस काबिल इंसान बनाना चाहते हैं । जिससे बुढ़ापे में बच्चे उनका सहारा बन सकें। जीवन के इस सफर में उनकी पत्नी सुनीता देवी पूरा साथ दे रही हैं। वह जात से सत्तू और बेसन पीस कर तैयार करती हैं। जिसे अशोक रोज बाजार लेकर जाकर बेचते हैं। इसी से उनके परिवार का खर्च चलता है। सच ही कहा है किसी ने कोशिश करने वाले की हार नहीं होती। आज अशोक अपने जीवन की गाड़ी को पटरी पर लाने में सफल हो गए हैं। आज वे किसी के सामने हाथ फैलाने को मजबूर नहीं हैं। वे डुमरांव थाना के कुशलपुर गांव के रहने वाले हैं।

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लेंथ मशीन चलाने में गई थी आंख की रौशनी
बक्सर । अशोक की पत्नी सुनीता देवी बताती हैं। वे लेंथ मशीन पर काम करते थे। जहां लोहा काटने और जोडऩे आदि का काम होता है। 2008 में उनकी आंखों की रौशनी चली गई। डाक्टर को दिखाया तो रेटिना की समस्या बताया। आपरेशन हुआ लेकिन रौशनी नहीं आई। डाक्टर ने पुन: आपरेशन को कहा। लेकिन, परिवार की माली हालत ठिक नहीं होने के कारण फिर आपरेशन नहीं हो पाया। उनकी दोनों आंखों की रौशनी चली गई तो पूरे परिवार का जीवन संकट में आ गया। लेकिन मुझे समझाया और सत्तू बेचने का निर्णय लिया। जिस आधार पर परिवार चल रहा है।
तीन बच्चों की है कंधे पर जिम्मेदारी
बक्सर । अशोक के तीन बच्चे हैं। बड़ा बेटा दीपक मैट्रिक की परीक्षा दे चुका है। बेटी 9 वीं कक्षा की छात्रा है। जो डुमरांव उषा रानी विद्यालय में पढ़ती है। तीसरा पुत्र विकास प्रजापति आठवीं कक्षा का छात्र है। वह डुमरांव के महावीर चौतरा स्कूल में पढ़ता है। पिता को बाजार तक साइकिल लेकर आने-जाने में सहायता करता है। सभी बच्चे अपने पिता के त्याग को देखकर उनकी सीख का अनुसरण कर रहे हैं।