अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी: गुरु के सम्मान से ही जीवंत होगी भारतीय ज्ञान परंपरा

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एमवी कॉलेज में कुलपति ने ग्रंथ संकलन का किया विमोचन, संस्कृत, योग और आयुर्वेद को बताया मानवता का आधार                                                              बक्सर खबर। स्थानीय महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के मानस सभागार में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में मानवता : एक अनंत यात्रा’ का बुधवार को समापन हो गया। दूसरे दिन भारतीय प्राचीन ज्ञान परंपरा की वैश्विक प्रासंगिकता पर गंभीर चर्चा हुई। संगोष्ठी के मुख्य संरक्षक एवं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी ने मंचासीन अतिथियों के साथ ग्रंथ संकलन का विमोचन किया। साथ ही शिक्षकों को संकलन की प्रतियां भी भेंट की गईं। अपने संबोधन में कुलपति ने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज में यदि गुरु का सम्मान पुनः स्थापित हो जाए, तो भारतीय ज्ञान परंपरा को समझाने के लिए अलग से सेमिनार आयोजित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य प्रो. कृष्ण कांत सिंह ने कहा कि दो दिनों के वैचारिक मंथन से निकले निष्कर्ष छात्रों और शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक साबित होंगे।

तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता प्रो. हरि प्रसाद अधिकारी ने संस्कृत साहित्य में निहित मानवतावाद पर प्रकाश डाला। वहीं विशिष्ट वक्ता प्रो. सुधाकर मिश्र ने भारतीय आयुर्विज्ञान और योग परंपरा को स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक बताया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए शोधार्थियों ने पर्यावरण, पारिस्थितिकी, नीतिशास्त्र और भारतीय दर्शन पर शोधपत्र प्रस्तुत किए। शोधपत्रों में भारतीय ज्ञान परंपरा की आधुनिक संदर्भों में उपयोगिता को रेखांकित किया गया। संगोष्ठी के संयोजक प्रियेश रंजन ने दो दिवसीय कार्यक्रम की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। वहीं डॉ. नवीन शंकर पाठक ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में सह-संयोजक डॉ. प्रीति मौर्या, डॉ. ओम प्रकाश आर्य और आयोजन सचिव डॉ. रवि प्रभात के योगदान की सराहना की गई। समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। इस अवसर पर महाविद्यालय के शिक्षक, शिक्षकेत्तर कर्मी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

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