बक्सर खबर। भागवत कथा के दौरान पूज्य जीयर स्वामी ने शुक्रवार को कहा कि छोटी सी भूल कभी-कभी विनाश का कारण बन जाती है। राजा चित्रकेतु बहुत ही प्रतापी राजा थे। उनकी एक लाख पत्नियां थी। लेकिन संतान नहीं थी। नारद मुनी उनके यहां पहुंचे तो चित्रकेतु ने उसने प्रार्थना की। पुत्र मांगा, लेकिन मुनी ने मना किया। वे नहीं माने और संतान की जिद करने लगे। मुनी के आर्शीवाद से उनकी ज्येष्ठ रानी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। लेकिन इस डाह में अन्य रानियों ने कुछ वर्ष बाद उसे खाने में जहर दे दिया। उसकी मृत्यु हो गई। राजा विलाप करने लगे। अंगिरा ऋषि के साथ नारद मुनी पुन: पधारे। राजा उनसे जिद करने लगे। मेरे पुत्र को जीवित कर दीजिए। नारद मुनी ने उन्हें बहुत समझाया। मैंने आपको पहले ही कहा था। आपके भाग्य में संतान सुख नहीं नहीं है। आप नहीं माने अब दुख में रो रहे हैं।

लेकिन वे बार-बार जिद करते रहे। अंतत: मुनी ने तप बल से बालक को जीवित कर दिया। राजा ने उसे गले लगा लिया। लेकिन उनके पुत्र ने कहा आप कौन हैं। मैं तुम्हारा पिता हूं। बालक ने पूछा कितने नंबर के, क्योंकि हर जन्म में कोई न कोई पिता होता है। यह बात सुन महाराज चित्रकेतु को वैराग्य हो गया। में महात्मा बन गए। कुछ समय बाद अपने तप बल से भगवान शिव के लोक पहुंचे। जिसे इलावृत खंड कहा जाता है। वहां भगवान शिव पार्वती जी के साथ आराम की मुद्रा में बैठे थे। यह देख महात्मा चित्रकेतु भड़क गए। वे शंकर जी को उपदेश देने लगे। भगवान हंसने लगे, नया-नया महात्मा बना है। कुछ बोले नहीं लेकिन, माता पार्वती को उनका आचरण बर्दास्त नहीं हुआ। चित्रकेतु को उन्होंने श्राप दिया जाओ मरकर तुम महापापी राक्षस बनोगे। सारे पुण्य कर्म करने के बाद भी चित्रकेतु अपनी भूल के कारण आगे चलकर वृतासुर राक्षस बने। इस लिए व्यक्ति को अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। उचित स्थान व परिस्थिति देखकर ही कुछ कहना चाहिए।

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