राशियों पर होगा अलग-अलग प्रभाव
बक्सर खबर। महाशिवरात्रि भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक माह में कृष्णपक्ष के चतुर्दशी तिथि को मनायी जाती है। लेकिन, फाल्गुनकृष्ण की चतुर्दशी विशेष है। क्योंकि इसी तिथि को आदि देव भगवान शिव करोड़ों सूर्य का तेज लिए अवतरित हुए थे। इसी तिथि को हिमालय राज की पुत्री पार्वती से उनका विवाह भी हुआ था। ऐसा भी कथाएं मिलती हैं। लेकिन इस वर्ष शिवरात्रि पर खास योग बन रहा है। जिसे ज्योतिषशास्त्र अमृतसिद्धि योग बता रहा है। इसके कई कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण सोमवार को शिवरात्रि का होना है। यह सुभ समय दोपहर 1:43 से प्रारंभ हो रहा है।

बाबा ब्रह्मेश्वर नाथ (ब्रह्मपुर)

क्या है सोमवार से संबंध
बक्सर खबर। सोमवार के स्वामी चन्द्रमा हैं। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा को सोम कहा गया है। भगवान शिव स्वयं सोमनाथ हैं। अत: सोमवार को महाशिवरात्रि का होना बहुत ही शुभ माना गया है। इस दिन पूजा करने से वे बहुत प्रसन्न होते हैं। इस तिथि को चन्द्रमा सूर्य के नजदीक होते हैं। ऐसे में सूर्य, चन्द्रमा शिव योग बना रहे हैं। शिव योग में पूजन, जागरण, और उपवास करने वाले मनुष्य का पुन: जन्म नहीं होता। आज श्रवण और घनिष्ठा नक्षत्र होने से सिद्धि एवं शुभ नाम के योग बन रहे हैं। वहीं तिथि, वार और नक्षत्र मिलकर सर्वार्धसिद्धि योग बना रहे हैं। इस वजह से इस बार की शिवरात्रि विशेष फलदेने वाली है।
किस राशि पर क्या होगा प्रभाव, सिद्धि व निवारण के तरीके
बक्सर खबर। ज्योतिषाचार्य नरोत्तम द्विवेदी बताते हैं विभिन्न राशियों पर महाशिवरात्रि का प्रभाव अगल-अलग होगा। जैसे मेष राशि -धनखर्च बहुलता, वृष-विविध सुख योग, मिथुन-नीचकर्म वृद्धि एवं पाप बुद्धि, कर्क-रोग भय, सिंह-यात्रा योग, कन्या-शत्रुनाश,पराभव, तुला-निराशा,दी:न, वृश्चिक-रोग भय, धनु-लक्ष्मी प्राप्ति,सुख, मकर-भय, कुंभ-पद हानि भय,कार्यहानि, मीन-धन क्षय,खर्च बहुलता। यह तो शिवरात्रि के प्रभाव हुए। इससे निवारण का मार्ग सुगम है। इस तिथि को श्रद्धालु शिवलिंग का पूजन अथवा अभिषेक कर इसके प्रभाव को कम कर सकते हैं। अथवा फलदायी बना सकते हैं।

पंडित नरोत्तम द्विवेदी

शास्त्रों मे विविध कामनाओं की पूर्ति हेतु विविध द्रव्यों से अभिषेक का विधान है। जल से रुद्राभिषेक करने पर वृष्टि, व्याधि शान्ति हेतु कुशोदक, पशुप्राप्ति हेतु दही, लक्ष्मी प्राप्ति हेतु इक्षुरस, धनप्राप्ति हेतु मधु तथा घृत, मोक्ष प्राप्ति हेतु तीर्थ जल, पुत्र प्राप्ति हेतु गोदुग्ध,ज्वरशान्ति हेतु जल, वंश विस्तार हेतु घृत, बुद्धि की जड़ता दूर करने हेतु शक्कर मिले दूध से, शत्रु नाश हेतु सरसो तेल, तपेदिक रोग,शुगर रोग दूर करने हेतु मधु से रुद्राभिषेक करने का विधान है। जिसका विस्तृत वर्णन वायुपुराण मे मिलता है।