आचार्य रणधीर ओझा ने सुनायी भक्त प्रह्लाद और समुद्र मंथन की महिमा बक्सर खबर। चौसा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन बुधवार को श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। मामाजी महाराज के कृपापात्र आचार्य रणधीर ओझा ने कथा की शुरुआत भक्त प्रह्लाद की अमर गाथा से की। उन्होंने कहा कि प्रह्लाद की अटूट भक्ति ने अधर्म के प्रतीक हिरण्यकशिपु के अहंकार को पराजित कर दिया। विपरीत परिस्थितियों और अत्याचार के बावजूद प्रह्लाद ने भगवान नारायण के प्रति अपनी आस्था नहीं छोड़ी। आचार्य श्री ने कहा कि जब तक मनुष्य के हृदय में ईश्वर के प्रति विश्वास रहता है, तब तक कोई भी संकट उसे डिगा नहीं सकता। कथा के दौरान उपस्थित श्रद्धालु प्रह्लाद की भक्ति और साहस को सुनकर भावुक हो उठे।
इसके बाद समुद्र मंथन की अध्यात्मपूर्ण कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि देवताओं और दानवों ने मंदराचल पर्वत से समुद्र मंथन कर 14 रत्न प्राप्त किए। यह कथा जीवन का गूढ़ संदेश देती है कि धैर्य, सहयोग और विवेक से ही जीवन के विष को पार कर अमृत प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने वामन भगवान की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान विष्णु ने ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि मांगकर पूरे ब्रह्मांड को नाप लिया। यह प्रसंग धर्म, दान और विनम्रता का अद्भुत उदाहरण है। कथा का चरम क्षण भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर आया। जैसे ही आचार्य श्री ने कंस के कारागार में श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन किया, पूरा पंडाल नंद के आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की के जयघोष से गूंज उठा। कथा के अंत में आचार्य रणधीर ओझा ने कहा कि भागवत कथा केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में अपनाने योग्य मार्गदर्शन है, जो मनुष्य को धर्म, भक्ति और सेवा की राह दिखाती है।
































































































