बक्सर खबर (गुरू गरम हैं)। गुरु का माथा ठनका हुआ है। वे शहर में कुछ दिनों से ऐसे डॉक्टर को ढूढ रहे हैं। जिसने हॉल-फिलहाल किसी की जान बचाई हो। लेकिन, कोई नजर आ नहीं रहा। ऐसा नहीं की उसका सरकारी होना जरुरी है। कहीं प्राइवेट भी तो चलेगा। लेकिन, ऐसा कोई मिल नहीं रहा। दूसरे आजकल ऐसी खबरें भी समाचार में नहीं छपतीं। फला डॉक्टर ने मरीज की जान बचा ली। हां गाहे बगाहे अस्पताल में मरीज की मौत और लोगों का हंगामा, वाली खबरें मिल जा रही हैं। कभी कभी तो डॉक्टरों ने मरीज को पीटा ऐसी खबर भी सामने आ ही जाती है। सेवा का बहिष्कार तो आम बात है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है। उन डॉक्टरों से अच्छे कंपाउंडर व एंबुलेंस वाले हैं। जो जान की बाजी लगाकर गाड़ी दौड़ाते हैं और मरीज को अस्पताल पहुंचाते हैं। कर्मी भी मरीज को देखकर तुरंत भिड़ जाते हैं।
डॉक्टर भले ही अपनी कुर्सी नहीं छोड़ता। चैंबर में बैठकर इलाज करना चाहता है। मरीज के परिजन परेशानी होने पर उसके पास पहुंच जाए तो डांट भी लगाते हैं। अगर वह सरकारी अस्पताल का हुआ तो बात सुनी नहीं की रेफर का पर्चा थमा देता है। अगर निजी में जाओ तो वे मरीज को मुर्गा समझते हैं। आपदा में अवसर की तलाश करने लगते हैं। मर्ज की तरफ ध्यान नहीं देते। जांच वाला पूर्जा थमा देते हैं। ऐसा होगा तो डॉक्टर का रुतबा कम होना लाजमी है। इसमें गुरू गरम होकर क्या करेंगे। जो पांच छह साल पढ़ के आए हैं, अंग्रेजी वाली किताब वे गुरू ही पढ़ा देंगे। ( गुरू गरम है, बक्सर खबर का साप्ताहिक कॉलम है। जो प्रत्येक शनिवार को प्रकाशित होता है। इसमें जन मानस से जुड़ी समस्याओं और ज्वलंत मुद्दों को उठाने का प्रयास किया जाता है। )































































































