‌‌क्या है बुढ़वा मंगल का राज, निकलता है महावीरी जुलूस

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-वर्षो पुरानी है यहां की परंपरा, होली के बाद होता है आयोजन
बक्सर खबर। बुढवा मंगलवार को बक्सर में महावीरी जुलूस निकलता है। यह परंपरा बहुत पुरानी है। सबसे पहले तो हम यह जान लें। बुढ़वा मंगलवार किसे कहते हैं। होली के बाद जो पहला मंगलवार आता है। उसका नाम ही बुढ़वा मंगल है। अपने शहर में इस तिथि को महावीरी पूजा का प्रचलन है। ऐसा क्यूं होता है? इसके बारे में बताते हैं पूजा समिति के सदस्य। यह उन दिनों की बात है। जब 18 वीं शताब्दी में प्लेग जैसी महामारी फैली थी। गांव के गांव साफ हो जाते थे।

उसी समय बक्सर में एक साधु ने परंपरा शुरू कराई थी। संकठ मोचन हनुमान की पूजा। शास्त्रों के अनुसार आरोग्य निधि का निर्माण कभी प्रभु हनुमान ने किया था। इस लिए जो उनकी पूजा निर्धारित विधि से करता है। उसे महामारी प्रभावित नहीं करती। तब से यह परंपरा बक्सर में चली आ रही है। इस वर्ष भी 10 मार्च को होली थी। संयोग से उस दिन मंगलवार था। उसके सात दिन बाद 17 तारीख को मंगल आया। इस दिन यह पूजा संपन्न हुई।
कोरोना भी नहीं रोक सका महावीरी पूजा का जुलूस
बक्सर खबर। इस वर्ष फरवरी में कोरोना का प्रभाव पूरे विश्व में सामने आ गया। सरकारी आदेश जारी होने लगे। भीड़ जमा नहीं करनी है। सरकारी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं। होली से पहले सभी स्कूल कालेज भी बंद हो गए। लेकिन, इसका प्रभाव अपने यहां होली पर नहीं पड़ा। लेकिन, यह सवाल उठने लगा। क्या होगा महावीरी पूजा का। लेकिन, जब इसका समय आया तो उसी उत्साह के साथ लोग पूजा में एकत्र हुए। दोपहर बाद से अखाड़ों के जुलूस निकले और देर रात तक यह दौर चला। शहर के विभिन्न हिस्सों से यह जुलूस निकला। प्रशासनिक पाबंदी के बाद भी युवाओं का उत्साह कायम रहा। कोरोना का भय लोगों को घर से बाहर निकलने से नहीं रोक पाया।

महावीरी पूजा में करतब दिखाते युवा व बच्चे

गाजे-बाजे के साथ जुलूस में लोग दिखाते हैं करतब
बक्सर खबर। होली के बाद निकले वाले जुलूस में शहर के हर छोटे बड़े हनुमान मंदिर में पूजा होती है। रथों पर संकट मोचन की प्रतिमा रख शहर का भ्रमण कराया जाता है। जिसके साथ सैकड़ो युवक आगे- पीछे चलते हैं। वे जय बजरंगी के नारे लगाते हैं और तरह-तरह के करतब भी दिखाते हैं। कुछ लोग तलवार और गदका भी भांजते हैं। बैंड पार्टी वाले भी इसमें शामिल होते हैं। पूरी तैयारी के साथ वे अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। फूल बेचने वाले माली हों या साउॅड सिस्टम का कारोबार करने वाले लोग। सभी अपना सहयोग प्रदान करते हैं। इस वजह से यह कार्यक्रम यादगार बन जाता है।

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