बक्सर खबर। धर्म का अर्थ ही है दया, प्रेम, परमात्मा में निष्ठा। वर्तमान युग की भाषा में कहें तो सकारात्मक उर्जा का केन्द्र। धर्म कहता है अगर अधर्मी भी धर्म के मार्ग पर चलने लगे तो उसे हम स्वीकार कर लेते हैं। इसके अनेक उदहरण हैं। क्योंकि हमारे यहां सभी के लिए दरवाजे खुले हुए हैं। इस धराधाम के महान तपस्वी व रामायण के रचैता महर्षी वाल्मीकि से बड़ा उदहरण और क्या हो सकता है। उनकी वापसी अनेक संदेश देती है। सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ है।

अगर आपका मन निर्मल व सच्चा है तो यहां मिला श्राप भी आपके लिए वरदान बन जाता है। अगर आप गलत रास्ते पर जा रहे हैं। तो आपका वरदान आपके लिए अभिशाप बन जाता है। अगर हम बात रामायण की करें। तो वहां राजा दशरथ को श्राप मिलता है। श्रवण कुमार की अनजाने में मृत्यु हो जाती है। उनके पिता राजा दशरथ को श्राप देते हैं। आप भी बेटे के लिए तड़प कर मरेंगे। राजा दशरथ की तीन पत्नियां थी। कोई संतान नहीं थी। जबकि वे स्वयं और उनका पूरा परिवार बहुत ही धर्म निष्ठ था। लेकिन उस श्राप का प्रभाव कहें या विधि का विधान। उनके यहां चार पुत्रों का जन्म हुआ। वहीं दूसरी तरफ महाप्रतापी रावण को अनेक वरदान प्राप्त थे। उसे कोई देवता मार नहीं सकते थे। नतीजा भगवान मनुष्य रुप में आए और उसे मार गिराया। अर्थात नियत और उद्येश्य सही हो तो आप का भला होगा। अगर आपका उद्येश्य सही नहीं तो उसका दंड आपको मिलना तय है। यह बातें पूज्य जीयर स्वामी जी महाराज ने रविवार को करहंसी गांव में कथा के दौरान कहीं। वहां 7 मार्च तक स्वामी जी की कथा होनी है।