बक्सर खबर। बतकुच्चन गुरु से पिछले सप्ताह मुलाकात नहीं हुई। इस बार भी उन्हें ढूंढने में मशक्कत करनी पड़ी। आमना-सामना होते ही गुरू मुस्कुराते हुए बोले, का हाल हौ गुरू। मैंने झट सवाल दाग दिया- पिछले सप्ताह मिले क्यों नहीं, सब खैरियत तो है? उन्होंने हां में सर हिलाया और पूछा, अपना बताइए? शहर का मिजाज इन दिनों कैसा है?

मैंने कहा, धरना-प्रदर्शन का दौर चल रहा है। इतना सुनते ही गुरू शुरू हो गए। बोले, हां गुरू… पहले लोग कहते थे, चुनाव आया है तो नेतवन सब दौड़ रहा है। लेकिन, अब मदारी से ज्यादा बंदरे सब जोर कर रहा है। जमाना बदल गया गुरू। यहां जेतना सब राजनीति करने वाला है, सब सड़क पर खड़ा हो जाता है। मुर्दाबाद…मुर्दाबाद सब ससुर एकही राग अलापता है। हम तो सोचे हैं अगर बबवा मंत्री न होता त सब केकर नाम के चिल्लाता, कवनो को लाइट एंड साउंड बनवाना हो, चाहे ओवर ब्रिज, कवनो के वेतन चाही, त कवनो के अस्पताल में दवाई। सब एक ही आदमी का नाम लेता है। इस सब देख हर मनई बुझ जाता है। सब के सब ससुर चुनावी बोखार में बीमार हवन। जब से लाइट एंड सउंडवा बंद हुआ। ओकर बाद चालू न हुआ। केतने जीते और केतने हारे। ससुर के सब बनर भकोल हैं। अस्पताल में दवा नइखे। उहां धरना देंगे। पुलिस चौकी पर धरना पुतला जलावेंगे। अरे फंूको ठंडा का दिन है, कौन रोका है। ए से अच्छा रहता कि शहर के कूड़ा कचरा फूंकते। आजकल सोशल मीडिया पर सब लिखत बाड़न। उहां एक लाइन लिख के अगले दिन दूसरे से पूछता है, देखे हैं हम का लिखे हैं। फार के रख दिए हैं। जे नहीं भेटाता है ओकरा फोन से पूछता है, देखे के नहीं देखे। ओही में एकाद गो नेता अइसन है जवन ध के खरखोच देता है। ओकरा खिलाफ लिखे में सब भकाउं हो जाता है। जो नहीं बोलता है ओकरा पर खूब भोंकता है। अपने को छछलोल आ दूसरे के भकोल समझता है। समाज में जउन कोर-कसर रह जाता है। ओके इ मीडिया वाला सब पूरा कर देता है। मीडिया का नाम आते मेरा माथा ठनका। मैंने उनकी तरफ बड़े ही नम्र भाव से देखा। कहीं हम्ही पर न बरस जाएं। वे मेरी बात समझ गए। बोले, तुम न घबराओ गुरू। इस खेल में दिल्ली से लेकर यहां के बाजार तक ल रहा है। तुम किस खेत की मूली हो। मैंने उनके सामने हाथ जोड़ लिया। वे हंसे और बोले, हमरा रोके से का होगा गुरू। आज देश में अगर सबसे ज्यादा प्रगति हुई है तो मीडिया की। भ्रष्टाचार में उसका नंबर आज दूसरा है। सरकारी महकमा तीसरे नंबर पर चला गवा। उनकी बात सुन मैं चुप रह गया। क्योंकि पिछले दो-तीन माह में यह बात मैं दो-तीन बार सुन चुका हूं। अब और ठहरने का कोई तूक नहीं दिखा तो उनसे इजाजत ली और अपने गांव की तरफ चल पड़ा। आजकल गांव में भी बिजली मिल रही है।