अंधा कानून : जनता झूठी, पुलिस की डायरी सच्ची

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बक्सर खबर : कानून अंधा है। यह कथन सत्य है। क्यूं कि कानून स्वयं की आंख से नहीं देखता। जांच एजेंसी अथवा पुलिस की आंख से देखता है। और पुलिस किस आंख से देखती है। यह जनता को बताने की जरुरत नहीं। क्योंकि उसकी नजर पर लगा चश्मा मौसम देखकर रंग बदलता है। खबर पढऩे वालों को यह बात तीखी भी लग सकती है और अटपटी भी। लेकिन जमाना सबूत ढुंढ़ता है। ताजा उदाहरण अनुमंडल कार्यालय के प्रधान लिपिक से जुड़ा है। यहां के बड़ा बाबू इससे पहले परिवहन कार्यालय में तैनात थे। पूर्व परिवहन कर्मचारी संजय त्रिपाठी को डीएसपी स्वयं गिरफ्तार करने पहुंचे थे। उनके साथ केस के अनुसंधान कर्ता भी थे। तीन जून अर्थात सोमवार को डीएसपी की गाड़ी अनुमंडल कार्यालय पहुंचती है। आइयो स्वयं एसडीओ कार्यालय जाते हैं। प्रधान लिपि संजय त्रिपाठी को बुलाकर बाहर लाते हैं। गाड़ी में पूर्व से डीएसपी बैठे थे। उनको लिए हुए पुलिस टीम नगर थाना पहुंच गई। त्रिपाठी को बताया गया आपको गिरफ्तार कर लिया गया है।

यह वह वाकया है। जब पुलिस ने कानून को तोड़ा। उस आदेश की अनदेखी की। जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी है। किसी भी लोक सेवक को उसके कार्य स्थल से बगैर पूर्व अनुमति के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। पुलिस से जब यह सवाल किया गया ऐसा कैसे हुआ? जवाब मिला उन्हें कार्यालय से नहीं बहार से पकड़ा गया। वे उस वक्त कार्यालय में नहीं थे। इसका उल्लेख पुलिस ने उस डायरी में भी किया है। जिसे त्रिपाठी के साथ न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया। अब यहां सवाल यह उठता है। जिसे सभी कर्मचारियों ने अपनी आंखों से देखा। अगर पुलिस भरी दोपहरी में सबके सामने हुए कृत्य पर पर्दा डाल सकती है। वैसे पुलिस अधिकारी अपनी डायरी में कितना सच लिखते होंगे। यह तो सबसे बेहतर वहीं जानते हैं। जिस डायरी में एक जगह सच की जगह झूठ हो उसमें दूसरी जगह अथवा जगह-जगह झूठ का प्रयोग भी हो सकता है। मीडिया का यह सवाल क्या गैर वाजिब है।

यज्ञ का पोस्टर

हमें नहीं थी पूर्व से जानकारी : एसडीओ
बक्सर : संयज त्रिपाठी फिलहाल अनुमंडल कार्यालय में बतौर प्रधान लिपित तैनात थे। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार किसी भी लोक सेवक को उसके कार्यस्थल से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। उसके लिए पूर्व से अनुमति लेनी होगी। पुलिस ने यहां उस नियम की पूरी तरह अनदेखी की। इस सिलसिले में बक्सर खबर ने डीएसपी शैशव यादव से भी सवाल किया। उन्होंने मना गिरफ्तारी उनकी जानकारी में हुई। वे स्वयं वहां तक गए थे। यही प्रश्न एसडीओ गौतम कुमार से किया गया। क्या आपने गिरफ्तारी की अनुमति दी थी। उन्होंने कहा हमें तब पता चला जब पुलिस ने उनको थाने पहुंचा दिया। इससे पूर्व हमें इसकी कोई जानकारी नहीं थी।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अनदेखी
बक्सर : पुलिस ने जब संजय त्रिपाठी को गिरफ्तार किया। वहां माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दो-दो आदेशों की अनदेखी हुई। पुलिस को शायद पता होगा। डीके बसू बनाम भारत सरकार केस की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने किसी की गिरफ्तारी के लिए गाइड लाइन तय किए हैं। किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय पुलिस पदाधिकारी को वर्दी में रहना होता है। जिस पर नेम प्लेट लगी हो। संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तारी का कारण बताते हुए उसे हिरासत में लेना है। साथ ही उसके परिजनों को तत्काल इसी सूचना देनी होती है। आपने सूचना किसी माध्यम से दी। इसका उल्लेख भी करना होता है। मौके पर मौजूद दो गवाहों का नाम भी उसमें दर्ज करना होता है। गिरफ्तारी के उपरांत उसका मेडीकल चेकप होने के उपरांत ही उसे थाने में ले जाया जा सकता है। प्रावधान यह भी है कि जेल भेजने से पूर्व भी उसका मेडीकल हो। जिला पुलिस ने इस मामले में लोक सेवक अधिनियम तथा डीके बसू बनाम भारत सरकार दोनों निर्देशों का उल्लंघन किया है।

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