बक्सर खबर : हमारा कर्म ही भाग्य बना है, भाग्य बनेगा और भाग्य बना था । परम पूज्य श्री जीयर स्वामी जी महाराज ने  (चन्दवा) आरा में यह उपदेश सोमवार को दिया। चातुर्मास्य व्रत के दौरान कथा चल रही भागवत कथा के दौरान कहा व्यक्ति को तीनों काल में कर्मवादी होना चाहिए। हमारे नहीं चाहने के बाद भी दुःख हमारा पीछा नहीं छोड़ता है । उसी प्रकार हमारे नहीं चाहने के बाद सुख भी हमारा पीछा नहीं छोड़ता है ।

इस लिए धीर व्यक्ति, धीर पुरुष एवं ज्ञानी पुरुष सुख की कामना नहीं करता है। स्वामी जी ने कहा कि भले ही अधर्म, अनीति, अन्याय और कृति कुछ समय के लिये अपने वर्चस्व में हो जाती है। लोगों के दिल दिमाग में छाई रहती है। लेकिन विजय अन्ततः सत्य की ही होती है। सही माने में नीति, न्याय और सत्य की विजय हमेशा होती है। भागवत् गीता में कहा गयाहै जहाँ पार्थ अर्जुन हैं, जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण है, वहीं श्री है, वहीं विजय हो और वही आनन्द है। महाभारत की लड़ाई में वस्तुतः विजय पाण्डवों की हुई। बड़े लोगों द्वारा हुयी चुक का परिणाम दण्ड के रूप में भोगना पड़ता है।

यज्ञ का पोस्टर

स्वामी जी ने कहा भारत वर्ष का मूल स्थान कभी हस्तीनापुर और कभी दिल्ली रही है। भारतवर्ष का शासकीय निर्देश हस्तीनापुर और दिल्ली से ही सम्राट बन कर किया जाता था। शास्त्र में कहा गया है  नीति, आचरण, कर्म, व्यवहार और स्वभाव से विहीन होकर अपना जीवन जीने पर उस राज के राजा को 1/4 दण्ड भोगना पड़ता है। धर्म, संस्कृति और अन्याय विहीन होकर जीवन जीने पर उसका 10% अपराध प्रजा को भी भोगना पड़ता है। उन्होंने कहा भगवान श्रीकृष्ण की आयु इस धराधाम पर 125 वर्ष बताई गयी है । जो इस प्रकार है – 100 वर्ष द्वारिका में, 15 वर्ष मथुरा में और 10 वर्ष वृन्दावन में। जगत का मंगल योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान इस प्रकार से इस धराधाम पर किए हैं ।