भक्ती में ही मुक्ती का मार्ग: साधना
बक्सर खबरः मन ही बधन और मुक्ती कारण है। यही मन संसार की तरफ मुडे तो बंधन भगवान की तरफ लगे तो मुक्ती देने वाला है। यह युक्त बाते देवरिया से पधारी कथा वाचिका मानस कोकिला सुश्री साधना शास्त्री ने संगीत मय मानस पाठ में कही। नेनुआ में आयोजित 80वें रामबउरा बाबा श्रीमदभागवत यज्ञ के अंतिम दिन श्रद्धाओं को संगीत मय कथा के माध्यम से शबरी के चरित्र चित्रण को भक्तों को सुना रही थी। शास्त्री ने कहा कि भगवान भक्त के व प्रतिक्षा से मिलते है। शबरी जाति की भीलनी का नाम था श्रमणा। बाल्यकाल से ही वह भगवान श्रीराम की अनन्य भक्त थी। उसे जब भी समय मिलता, वह भगवान की सेवा−पूजा करती। घर वालों को उसका व्यवहार अच्छा नहीं लगता। बड़ी होने पर श्रमणा का विवाह हो गया। पर अफसोस, उसके मन के अनुरूप कुछ भी नहीं मिला। उसका पति भी उसके मन के अनुसार नहीं था। यहाँ के लोग अत्यंत अनाचारी−दुराचारी थे। श्रमणा का उनसे अक्सर झगड़ा होता रहता था। श्रमणा जैसी सात्विक स्त्री का रहना बड़ा कष्टकर था। इस वातावरण से निकलना चाहती थी। वह किसके पास जाकर आश्रय के लिए शरण मांगे! यह भी एक समस्या थी। काफी सोच−विचार के बाद उसने मतंग ऋषि के आश्रम में रहने का निश्चय किया। ऋषी ने आने का कारण पूछा उसने बहुत ही नम्र स्वर में अपने आने का कारण बताया। ऋषि सोच में पड़ गए उन्होंने श्रमणा को अपने आश्रम में रहने की अनुमति दे दी। वह व्यवहार और कार्य−कुशलता से शीघ्र ही आश्रमवासियों की प्रिय बन गई।

भगवान श्रीराम सीता की खोज में मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे। श्रमणा को बुलाकर कहा, जिस राम की तुम बचपन से सेवा−पूजा करती आ रही थीं, वही राम आज साक्षात तुम्हारे सामने खड़े हैं। शबरी भागकर कंद−मूल लेने गई। कंद−मूलों के साथ वह कुछ जंगली बेर भी लाई थी। कंद−मूलों को उसने श्री भगवान के अर्पण कर दिया। पर बेरों को देने का साहस नहीं कर पा रही थी। कहीं बेर खराब और खट्टे न निकलें, इस बात का उसे भय था। उसने बेरों को चखना आरंभ कर दिया। अच्छे और मीठे बेर वह बिना किसी संकोच के श्रीराम को देने लगी। श्रीराम उसकी सरलता पर मुग्ध थे। उन्होंने बड़े प्रेम से जूठे बेर खाए। श्रीराम की कृपा से श्रमणा का उद्धार हो गया। वह स्वर्ग गई राम व शबरी कथा। इस लिए भक्ती ही मुक्ति का मार्ग है।