(पुण्य तिथि पर विशेष ,21 अगस्त) 
बक्सर खबर : कोई काम छोटा नहीं होता। अगर माद्दा हो तो हर शख्स अपनी पहचान बना सकता है। डुमरांव के बंधन पटना मुहल्ले में जन्में कमरुद्दीन पर यह बात सटीक बैठती है। कभी बिहारी जी मंदिर में शहनाई का रियाज करने वाले कमरुद्दीन बचई मियां के दूसरे पुत्र थे। उनके वालिद पैगम्बर खां उफ बचई मियां व अम्मी जान मित्थन बेगम ने पारिवारिक तंगी को देखते हुए उन्हें मामा अलिबख्श के साथ वाराणसी भेज दिया। जहां उन्हें नया नाम मिला। बिस्मिल्ला खां, होनहार नौजवान थे। बिहारी जी मंदिर से नाता टूटा तो उन्होंने अस्सी घाट पर अपनी धुन को निखारना शुरू किया। उनकी मीठी धुन को पूरे देश ने तब सूना और जाना जब 15 अगस्त 1947 को लाल किले से शहनाई बजाई। यह उनके लिए गौरव की बात थी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु उन्हें बहुत स्नेह देते थे। जब 26 जनवरी 1950 को जब गणतंत्र राज्य का संविधान प्रभावी हुआ तब भी उत्साद ने शहनाई बजाई थी।

यह है जन्म शताब्दी वर्ष
उत्साद का जन्म 21 मार्च 1916 को शाहाबाद जिले के बक्सर अनुमंडल के डुमरांव कस्बे में हुआ था। जिसे अब लोग बक्सर जिले के डुमरांव अनुमंडल के बंधनपटवा मुहल्ले के रुप में जानते हैं। भारत रत्न से नवाजे गए उत्साद के जन्म को सौ वर्ष पूरे हो गए हैं। 21 अगस्त 2006 को इन्होंने हमे अलविदा कह दिया। उनके जाने के बाद एक गीत लोगों की जुंबा पर खूब दुहराया गया। दिल का खिलौना हाय टूट गया। गुंज उठी शहनाई फिल्म के इस गीत में उन्होंने ने ही यह धुन बजाई थी।
लता जी के साथ मिला था भारत रत्न
बक्सर : उत्साद जब तक जीवित रहे। शहनाई से उनका संग बना रहा। शहनाई छूटी तो वे भी चल बसे। इस देश ने उन्हें भरपूर सम्मान दिया। 1956 में संगित नाटक अकादमी एवार्ड प्रदान किया गया। 1961 में पद्यमश्री, 1968 में पद्यम भूषण, 1980 में पद्यम विभूषण। इसके उपरान्त वर्ष 2001 में वाजपेयी सरकार की अनुशंसा पर स्वर कोकिला लता मंगेसकर के साथ भारत रत्न प्रदान किया गया।

अपने गृह नगर में उपेक्षित है उत्साद
बक्सर : उत्साद बिसमिल्ला खां ने उस उचाई का छूआ है। जहां तक जाना हर भारतीय के लिए गर्व की बात है। उनका नाम किसी सरकार की पैरवी का मोहताज नहीं रहा। लेकिन, सस्ती राजनीति करने वालों के लिए उनका गृह नगर सीख भी है। कभी मुख्यमंत्री रहे लालू यादव ने उनके नाम पर यहां नगर भवन बनाने की बात कही थी। पिछले वर्ष डुमरांव आए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कृषि कालेज की स्थापना के वक्त भी उनकी याद में कुछ करने को कहा था। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। डुमरांव में उनका घर भी जमिंदोज हो चुका है। क्योंकि उनके परिवार वाले स्वयं शहर छोड़ वाराणसी के निवासी हो गए हैं। डुमरांव के रहने वाले राजेश चौरसिया कहते हैं कि उनकी याद में यहां कुछ भी ऐसा नहीं हुआ। जिससे आने वाली नस्ल सीख ले। डुमरांव राज परिवार के युवराज चन्द्रविजय सिंह ने कहा कि बिहार की सरकार ने इस जिले की हमेशा उपेक्षा की है। राज्य के दो-दो मुख्यमंत्रियों ने आश्वासन दिया। पर उत्साद के सम्मान में कुछ भी नहीं किया। वर्तमान राज्य सरकार के दो-दो सांसद यहां से हैं। उनकी जिम्मेवारी है कि वे यहां के लिए कुछ करें।