बक्सर खबर : जय काली डुमरांव नगर वाली। के जय घोष से पूरा डुमरांव शहर सुबह से ही गुंजायमान है। आज ३० सितम्बर को मां काली की वार्षिक पूजा संपन्न हो रही है। मंदिर के पुजारी ललन मिश्रा के अनुसार श्रावण मास की शुक्लपक्ष सप्तमी को यह वार्षिक पूजा होती है। एकम से ही मां का जलाभिषेक प्रारंभ हो जाता है। सप्तमी को दोपहर तक पूजा व अनुष्ठान कार्य संपन्न हो जाता है। वैसे श्रद्धालु भक्तों का आना जाना पूरे दिन लगा रहता है। डुमरांव शहर के पूरब दिशा में यह मंदिर काव नदी के किनारे स्थित है। जैसे-जैसे शहर की आबादी बढ़ रही है। मंदिर की आभा और भव्यता भी बढ़ती जा रही है। स्थानीय लोगों को नगर काली के प्रति इतना लगाव है। जिसके कारण मां के मंदिर को नगर काली अथवा नगर पंचित काली मंदिर के नाम से जाना जाता है।

वर्षो पुराना है इतिहास
बक्सर : डुमरांव का पुराना काली मंदिर अति प्राचीन है। वरीष्ठ पत्रकार अनिल ओझा बताते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार यहां पासी व बहेलिया समाज पूजा करता था। आज भी इस समुदाय के लोग ही मुख्य पूजा में सबसे सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

दर्शन करने वालों की लगी कतार

युवाओं ने दिया मंदिर को नया स्वरुप
बक्सर : वैसे तो डुमरांव की नगर काली का मंदिर वर्षो पुराना है। लेकिन हाल के वर्षो में कुछ युवाओं ने इसे नया स्वरुप दे दिया है। वे अथक परिश्रम से लगातार धर्मादा एकत्र करते चले आ रहे हैं। सबके सहयोग से मिल उन्होंने मंदिर के भवन का विस्तार कराया है। इतना ही नहीं पुरानी छतों व फर्स को तोड़ आकर्षक स्वरुप दिया गया है। यह युवाओं की लगन का प्रयास है।

दर्शन को जमा भीड

कुछ शहर वासियों ने बताया कि उनका उत्साह देखकर हम लोग दंग रह जाते हैं। हमें जो नाम ज्ञात हुए हैं। उनमें मंदिर समिति के अध्यक्ष भगवान वर्मा, धर्मेन्द्र सिंह, बंधन वर्मा, अशोक, दिलीप यादव, अमित कुमार, संतोष गुप्ता, रोहित, अंकित, राजा, कल्लू, सीताराम, विक्की, छोटू, लव कुमार, हेमंत आदि शामिल हैं।

काली पूजा में लगा मेला

लगता है मेला
बक्सर : मां के वार्षिक पूजा उत्सव का इंतजार बड़ों से ज्यादा युवाओं और बच्चों को रहता है। क्योंकि यहां पूजा भी होती है और मेला भी लगता है। जिसे देखने के लिए बच्चे यहां तक आते हैं। उनके उत्साह को बनाए रखने के लिए पूजा समिति ने भी इस वर्ष मंदिर परिसर को भव्य तरीके सजाया है।

खप्पर पूजा में शामिल लोग

शहर की शंति व खुशहाली के लिए होती है पूजा

बक्सर: हमारे जिले में ऐसी मान्यता है। लगभग हर गांव में मां काली की वार्षिक पूजा होती है। गांव की खुशहाली, शांति व समृदिध के लिए प्रत्येक वर्ष तय तिथि को यह वार्षिक परंपरा निभाई जाती है। लेकिन पूरे जिले में डुमरांव की काली पूजा सबसे मशहूर है। क्योंकि यहां जिस उत्साह और भव्यता के साथ पूजा होती है। जिले में कहीं और इतना भव्य उत्सव देखने को नहीं मिला।